Saturday, August 24, 2013

Constitution (Forty second Amendment) Act

कर्त्तव्य की भावना जब मौलिक ना रही,
मौलिक कर्त्तव्यों का एक अध्याय आ गया!

चंद नज़्म, जश्न-इ-आज़ादी पर

छयासठ बरस में हमनें, कहते हो क्या पाया है?
उम्मीद का वादा था, वादा तो निभाया है!

***

चीन पर, पाकिस्तान पर कभी, उठी ऊँगली और हो गयी वतनपरस्ती?
छयासठ बरस बीत गए, आओ इस नादानी से भी आज़ाद हो जायें!

बंधन या आज़ादी?

उड़ती हुई पतंग...
डोर को, मन ही मन,
कोसती ज़रूर होगी
इस बंधन में शायद,
छटपटाहट भी होती हो
"क्या मुझे हक़ नहीं स्वच्छंद उड़ने का?"
मगर जब डोर कट जाती है,
तो उड़ान भी खतम...
हवाओं में भटक कर,
पड़ी होती है किसी पेड़ की डाली में,
बेबस, लाचार...

डोर से बंधी पतंग,
शायद,
आज़ादी के मायने सिखा जाती है!

Monday, June 17, 2013

बारिश और ओस













बारिश की बूँदें और ओस...

वैसे तो दोनों ही प्रेसिपिटेशन के फॉर्म्स हैं
पर दोनों में बुनियादी फर्क है थोड़ा।

ओस की बूँदें,
हौले-हौले प्यार से,
कब आ जाये, पता भी नहीं चलता!
फिर देखते ही देखते,
वृक्षों के पत्ते, घास के मैदान,
सब उसके आगोश में आ जाते हैं।

और बारिश,
अरेंज्ड मैरिज की तरह बांध दिया जाता है सबके गले से!
जैसे बादल पैट्रिआर्की दिखा रहा हो

मगर जब रात ढल जाती है,
और सुबह सूरज की किरणें कच्चू के पत्तों पर पड़ती हैं,
सारी बूँदें एक-सी ही टिमटिमाती हैं।
तब बारिश में और ओस में फर्क करना मुश्किल है

Wednesday, March 27, 2013

होली २०१३

हम में, तुम में फर्क रहे ना,
गहरा सब पर रंग चढ़ाओ
होश में सब ही ख़तरनाक हो,
सुद-बुद खो दो, भंग चढ़ाओ
मशीनों वाली केंचुली त्यागो,
हाड़-माँस का अंग चढ़ाओ
इक दिन भूलो अदब, सलीका,
मस्ती और हुड़दंग चढ़ाओ
हम में तुम में फर्क रहे ना,
होली का यों रंग चढ़ाओ !!

Tuesday, February 05, 2013

On Republic Day 2013

आँखें बेबस सी देख रहीं होती हैं जब,
ज़ुबाँ पे इक आह भी आती नहीं
कुछ कहना अगर चाहें तो,
अनसुनी कर देता है, कान, हर आवाज़ को
हाथ उठते भी हैं तो बस कलम थामे,
लिखता जाता हूँ कथनी और करनी का अंतर
दिल कुछ करना जो चाहे कभी,
दिमाग वॉक आउट कर जाता है,
एक "ज़िम्मेदार विपक्ष" की तरह

मेरे अंदर का गणतंत्र भी "मैच्योर" हो गया है शायद!

Thursday, August 30, 2012

Untitled

रोज़ रात,
जब मैं ऑफिस से घर जाती,
चाँद मेरे साथ-साथ चलता
मुझे देखकर मुस्कुराता,
मैं उस से अपने किस्से सुनाती,

पर वो कुछ न कहता,
अजीब दोस्त था मेरा!

उस रात,
जब मैं हवस का शिकार हुई,
चाँद तब भी खामोश था
मैं चीखी, चिल्लाई,
लड़-हार कर मेरे अन्दर की लड़की अब मर गयी थी
पर उस दरिन्दे को इस से क्या मतलब,
उसे तो बस देह चाहिए था
और देह मेरा, अब भी जिंदा था
कुछ देर के बाद शायद तरस आ गया मेरी हालत पर,
या शायद "भूख" मिट गयी उसकी
मुझे, अपनी "मर्दानगी" के सबूत को,
सड़क पर छोड़ वो चला गया
मैं बेजान पड़ी सोचती रही,
संयम उसने खोया,
इंसानियत को बदनाम उसने किया,
फिर इज्ज़त मेरी क्यूँ लुटी?
जबकि मुझे पता था,
कल न्यूज़ चैनल पर चेहरा मेरा ही ब्लर्रड होगा,
मोहल्ले वाले मेरे ही आबरू के किस्से उछालेंगे
और वो,
छुट्टा घूम रहा होगा,
दोस्तों से अपनी "वीर-गाथा" सुनाता!

मैं आज भी वहीँ पड़ी हूँ,
बेजान
और चाँद,
आज भी बस देख ही रहा है!


Tried a different theme, sometimes back.