आलीम हैं, इससे ज़्यादा और क्या करेंगे?
शेर लिखेंगे, और वक्त ज़ाया करेंगे ।कुछ करने की उम्मीद मत करना हमसे,
जहाँ-ए-बेदार सुनाएंगे, बातें बनाया करेंगे ।
हाकीमों के नगमें सुनाया किये हैं,
आवाम बेज़ुबाँ, फिर क्या गाया करेंगे?
हम-मज़हब हुआ तो फ़रिश्ता, वरना काफ़िर
इंसाँ को कब इंसाँ बुलाया करेंगे?
शुतुरमुर्ग-सा रेतों में दबाए रखा सर,
सोचा के सबकुछ खुदाया करेंगे!
नुक्स ढूंढा करते थे मुद्दों पे अकसर,
नुस्खे का हुनर अब दिखाया करेंगे ।
हुकूमत ने मोहरों-सा खेला है अबतक,
मोहरे अब सियासत में अदब लाया करेंगे ।
आलीम = बुद्धिजीवी, विद्वान
ज़ाया = बर्बादजहाँ-ए-बेदार = मुश्किलों भरी दुनिया
हाकीम = सत्ताधारी
हम-मज़हब = अपने धर्म का
नुक्स = खोट, गलतियाँ
नुस्खे = हल, समाधान
मोहरों-से = मोहरों की तरह
हुकूमत = सरकार
सियासत = राजनीति
2 comments:
chand panktiyo me bahut kuch keh diya hai. samaj ke teen tarah ke logo ko ek sath pesh karne wali bahut hi tarif-e-kabil gazal hai.
नुक्स ढूंढा करते थे मुद्दों पे अकसर,
नुस्खे का हुनर अब दिखाया करेंगे ।
paripartan ke prati sakaratmak soch ka bahut hi umda udaaran hai.
lage raho!!!!
bahut bahut dhanyawad :)
ghazal ki duniya me pehla kadam tha, to socha sabse pehla war apne jaise "buddhijiviyon" pe hi kiya jaye
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