Thursday, September 22, 2011

सलाम इंडिया

हर अज़ान पे आता है लबों पर जो नाम इंडिया,
तेरे सदके मैं, है तुझको सलाम इंडिया |

वो ये कहते हैं के दो मुल्क बसते हैं यहाँ,
है मुकाबला सा, भारत बनाम इंडिया |

मैं कहता हूँ दो नहीं, अट्ठाईस भी नहीं,
हैं 121 करोड़ नाम, या है बेनाम इंडिया |

जो बदला जहाँ है, तो बदले हैं हम भी,
पहले था गाँधी, अब है कलाम इंडिया |

कुछ बात है मगर जो के बदली नहीं है,
के अब भी अमन का है पैग़ाम इंडिया |

एक पीढ़ी ने अपना सबकुछ लुटाकर,
दिया आज़ादी का हमें ईनाम इंडिया |

उठो अब, लो बागडोर हाथों में अपने,
आओ बनायें वतन-ए-इतमाम इंडिया |



इतमाम = perfection


- written on Aug 15, 2011

Kgp के प्रति...

5 साल में इंजिनियर बन निकलेंगे,
गए थे तेरे दर ये कयास लगाए |
मगर जो हुआ वो बयाँ क्या करें हम,
न इंजिनियर हैं, न बाहर ही आए |

- written on Aug 18, 2011 (Institute Foundation day)

हार नहीं मानूंगा...

कभी सियासती हमले से परेशान हूँ,
कभी बुद्धिजीवियों की बातों से हैरान हूँ |
गिर के उठा हूँ कई बार, फिर उठ जाऊंगा,
संभलना मुझे आता है, मैं हिंदुस्तान हूँ |


- Written on Aug 20, 2011

Sunday, April 10, 2011

गज़ल

सुना जो ग़ालिब को, फिर कुछ और सुनाई ना दिया,

जहाँ-ए-आलम में सिवा ग़ज़ल कुछ दिखाई ना दिया |


ज़माने ने दिया तालीम, कूबत-ए-सुख़न बेपनाह,

कर सके न फिर भी शायरी, के तनहाई ना दिया |


लोग कहते हैं तुझ को नेक-जिगर जाने क्यूँ कर,

इक नज़र में ही ले ली जान, औ सफाई ना दिया |


खुले थे कान मगर दिल पे था लगा ताला,

और कहते हो "मुझको कुछ भी सुनाई ना दिया" ?


जिये खुद-ही के लिए, तो गुमनाम ही मौत आएगी,

फिर न कहना किसी ने अश्क-ए-विदाई ना दिया |


यूँ तो अरसे से था जेहन में लिये बारूद "कर्मू",

पर कमबख्त किसी ने अब तलक सलाई ना दिया |




शब्दार्थ:

तालीम = शिक्षा

कूबत-ए-सुख़न = कविता करने की क्षमता

अश्क = आंसू

सलाई = माचिस

Saturday, January 29, 2011

जो खुबसूरत कहूँ, तो खूबसूरती को गुरूर हो

तेरा आना जहाँ में जैसे कोई दस्तूर हो,

ग़म से भरी दुनिया, इक "ख़ुशी" तो ज़रूर हो |


निगाहें तो औरों की भी होंगी मयकशी,

तेरी खुशबू बस छू जाए 'गर तो सुरूर हो |


लालची-दिल बिदक जाये तुझे जो कोई और देखे,

सिरफ मेरे दिल के घरौंदे में तू मशहूर हो |


ख़यालों से एक पल भी तू जुदा न हुई,

तो क्या हुआ के निगाहों से अभी दूर हो |


मिलन की आस में लिखे शेर तो आयत हो गए,

अर्जियाँ, दरबार में उसके, जाने कब मंज़ूर हो |


इंतज़ार में तेरे, हर रोज़ मेरा रोज़े सा हुआ,

हो दीदार मयस्सर, तो अपनी ईद हुज़ूर हो |


लब्ज़ कहाँ से लाए तेरे इस्तकबाल को "कर्मू",

जो खुबसूरत कहूँ, तो खूबसूरती को गुरूर हो |




सुरूर = नशा

इस्तकबाल = स्वागत/तारीफ

आयत = पवित्र कुरान की पंक्तियाँ

मयस्सर = नसीब


Friday, January 21, 2011

गज़ल

आलीम हैं, इससे ज़्यादा और क्या करेंगे?
शेर लिखेंगे, और वक्त ज़ाया करेंगे ।

कुछ करने की उम्मीद मत करना हमसे,
जहाँ-ए-बेदार सुनाएंगे, बातें बनाया करेंगे ।

हाकीमों के नगमें सुनाया किये हैं,
आवाम बेज़ुबाँ, फिर क्या गाया करेंगे?

हम-मज़हब हुआ तो फ़रिश्ता, वरना काफ़िर
इंसाँ को कब इंसाँ बुलाया करेंगे?

शुतुरमुर्ग-सा रेतों में दबाए रखा सर,
सोचा के सबकुछ खुदाया करेंगे!

नुक्स ढूंढा करते थे मुद्दों पे अकसर,
नुस्खे का हुनर अब दिखाया करेंगे ।

हुकूमत ने मोहरों-सा खेला है अबतक,
मोहरे अब सियासत में अदब लाया करेंगे ।




आलीम = बुद्धिजीवी, विद्वान
ज़ाया = बर्बाद
जहाँ-ए-बेदार = मुश्किलों भरी दुनिया
हाकीम = सत्ताधारी
हम-मज़हब = अपने धर्म का
नुक्स = खोट, गलतियाँ
नुस्खे = हल, समाधान
मोहरों-से = मोहरों की तरह
हुकूमत = सरकार
सियासत = राजनीति

Tuesday, October 24, 2006

स्वयं की तलाश

एकाकी की परछाइयों में,
मन की गहराइयों में,
जब खो जाता हूँ मैं,
स्वयं को स्वयं से दूर ही पाता हूँ मैं।


कई लोगों से मैं मिला,अनेकों को जाना।
पर कहाँ मिलाप हुआ मेरा स्वयं से,
खुद को कहाँ है पहचाना ?
परिजनों को प्यार से,परजनों को ललकार से,
भिन्न-भिन्न व्यवहार से,सारे संसार से,
जब अपना परिचय बताता हूँ मैं,
स्वयं को स्वयं से दूर ही पाता हूँ मैं।

जीवन एक युद्घ,प्रतिदिन-प्रतिपल मैं लड़ रहा हूँ।
पथ में आती हार को कर के दरकिनार
बस जीतने का प्रयास कर रहा हूँ
जीत की आशा में,हार की निराशा में,
कठिण प्रयास में,दुःख में,उल्लास में,
जब खुद को ढूंढ़ना चाहता हूँ मैं,
स्वयं को स्वयं से दूर ही पाता हूँ मैं।


जीवन की इस भाग दौड़ में,
एक दूजे से आगे बढ़ने की होड़ में,
ऐसा लगता है कहीं कुछ छूट गया है,
मेरा मन जैसे मुझसे रूठ गया है।
इस आपाधापी से जब भी कुछ क्षण
अपने लिये चुराता हूँ मैं,
स्वयं को स्वयं से दूर ही पाता हूँ मैं।

खुद को जानने की कोशिश में,
मैंने बस इतना जाना है,
जीवन का एक गूढ़ रहस्य,
शायद मैंने पहचाना है।
हार-जीत निरर्थक,यहाँ
जीत का प्रयास ही जीत का अहसास है।
ज़िंदगी है ऐसा सफ़र जिसमें,रास्ते बड़े मंज़िलों से
स्वयं को पाना महत्वपूर्ण नहीं,
महत्वपूर्ण स्वयं की तलाश है ।।